Thursday, December 17, 2020

प्रकृति मै और मेरा साहित्य

प्रकृति मै और मेरा साहित्य - संकलित सह्भागिता 

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admin - bss / ns/ 

माध्यम- भारतीय साहित्य संगम--- व ----- - / नारी शक्ति - समूह  

संपादकीय - डा० अरुण कुमार शास्त्री 

सेल्फी स्थान व प्रष्ठ भूमि - उद्यान - टीपू सुलतान का मकबरा व लाईब्रेरी - मैसूर  

            रचना - - 
आसमां है - जमी है , मै हूँ - मौसम भी है 
कुदरत की सब नेमते हैं 
वक्त है , मौका है , नजाकत है 
सामाजिक परिवेश की अदावत है 
भावनाये है - शब्द है - राग है 
प्रकृति का अद्भुत अनुराग है 
हे सखी - मगर तुम कहां हो 
ये तो बहुत खेद की बात है // 
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प्रस्तुती - गीता ठाकुर दिल्ली 

 



१७/१२/२०२०    विषय *प्रकृति🌳🌻🌿

    ये सेलफी आज सवेरे मेरे अपने ही घर की है। जैसे ही धूप निकली और बाहर जाकर देखा, सच में मन बहुत खुश हुआ ये देख कर, गुनगुनी धूप और भी खुश नुमा लग रही थी। जल्दी से सेल्फी पोज लिया ताकि याद रहे। ये है हमारी प्रकृति। एक बीज से इतना सब कुछ देती है। 

    प्रकृति की हर चीज में अदभुत खज़ाना छिपा हुआ है। उसको अपने ह्रदय स्तर से समझने की बात है। प्रकृति को कभी भी अपनी सम्पदा का घमंड नहीं होता। सिर्फ इंसान ही है कि उसे ज्लदी से घमंड हो जाता है।

    ये कौन चित्रकार है, जिसने सारे पेड़ पौधे, फल, फूल बनाएं। सबको एक ही ऊंचाई दी।

    प्रकृति हमारी उत्कृष्ट शिक्षक है। प्रकृति को हम किताबों से नहीं पड़ सकते। इसके साथ रहने से, महसूस करने से समझ सकते हैं। एक तम्बाकू कि पैदावार करने वाला करोड़ों रुपए कमा सकता है जो किसान अन्न देने वाला अन्नदाता है वो गरीब है। उन्हें आत्महत्या करनी पड़ती है। समझ नहीं आता कि ये देश आगे जा रहा है या पीछे जा रहा है। अंत में मैं यही कहना चाहूंगी कि यदि आप और हम सभी प्रकृति में सुंदरता देख पाते हैं तो निश्चित ही आप प्रकृति के नज़दीक हैं ।

    प्रकृति से प्रेम करिए, ये भी आपके सौ गुना अधिक प्रेम करेगी। धन्यवाद महोदय जी 🙏

     गीता ठाकुर दिल्ली से 🙏  🌸🌿🌻🍀🌳🍁☘️🎋🍂🥀🌹🌷🍥🍥👏🏻

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श्रीमती गायत्री ठाकुर "सक्षम"  नरसिंहपुर ,मध्य प्रदेश



मैं श्रीमती गायत्री ठाकुर "सक्षम", नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश से आज दिनांक 17 दिसंबर सेल्फी प्रतियोगिता के लिए अपनी  सेल्फी प्रेषित कर रही हूं। मेरे पीछे एक घना आम्र वृक्ष है उससे संबंधित मेरे विचार एक कविता के माध्यम से प्रस्तुत हैं,

 जो कि निम्नांकित हैं–– 

यह आम्र वृक्ष है कितना प्यारा,

देता सुकून मुझे कितना सारा।

 जब चलती इसकी ठंडी बयार,

 दिल में उठता एक नया खुमार।

 जब आता है बसंत भीनी खुशबू,

 फैल जाती है पूरे  घर आंगन में।

 महक जाती है पूरी बगिया मेरी,

कोयल कुहकने लगती अमराई  में।

 सुनकर उसकी कुहुक मेरा मन भी,

 खुशियों से भरकर गाने लगता है ।

वातावरण सुरभित होकर "सक्षम",

 सर्वत्र  उल्हास बिखेरने लगता है।

श्रीमती गायत्री ठाकुर "सक्षम"   नरसिंहपुर ,मध्य प्रदेश

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    🌹मधु वैष्णव "मान्या" 🌹 विधा मुक्त रचना,जोधपुर, राजस्थान


जैसे ही इंटरनेट  ऑन किया सबसे पहले  यही पटल खुला और कोइंसिडेंसली आज ही मैंने अपने बगीचे के सारे फूल इकट्ठे किए थे अपनी पोट में तो इच्छा हुई कि मैं एक सेल्फी लूं और आज आपने वही पॉइंट रखा तो मुझे बहुत अच्छा लगा,,,,,,❤️❤️

🌹 पुष्प 🌹

उम्मीदों की दहलीज पर,

 अक्सर खिलते,

अभिलाषाओं के पुष्प,,,,,,।

मृगतृष्णा की राह में,

ढेर सवालों का,

जिंदगी के रंगमंच पर,

खिलते किरदारों के पुष्प।

करती रहूं दुआ ,

कुछ ऐसी मैं,

 श्रद्धा और संस्कृति,

 की राहों में,

 खिलते रहे रस्मो रिवाज के पुष्प।

 मधु,,,मन की उर्वर,

 अवनि पर,

होते रहे प्रस्फुटित ,

अमित जीवन के पुष्प।

    🌹मधु वैष्णव "मान्या" 🌹 विधा मुक्त रचना,जोधपुर, राजस्थान

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शीला सिंह ,  बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏


हे प्रकृति !  जीवन दायिनी 
मानव  चिर  संगिनी  है  तू,
प्रेरणादायिनी इस जग की
नियामक और भविष्य द्रष्टा,
बंधन सारणी प्रेषिणी  नित
जीवंतता पालक पोषक है तू। 

कोमल कोंपल निज तन शोभाए
भिन्न रंग पुष्प पर्ण डाल सजाए 
शीतल नीर संग शान्त सहजता
मन्द समीर मन प्रफुल्ल समाए
ऊंचे शैल रजत हिम ओढ़नी
स्वर्ण रश्मि दिवाकर आ फैलाये। 

शीला सिंह
 बिलासपुर हिमाचल प्रदेश 🙏

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Wednesday, November 25, 2020

तुमसे नेहा लगा के दीवाना हो गया हूँ सीरीज़ 1 एपिसोड 1

डॉ अरुण कुमार शास्त्री 

@

एक अबोध बालक ** अरुण अतृप्त 


रोज़ भरता हूँ 

रोज़ पीता हूँ ।।

तुझे एय्य जिंदगी 

मैं रोज़ जीता हूँ ।।

तुमसे नेहा लगा के 

   दीवाना हो गया हूँ ।।    

इश्क़ में तेरे 

बेग़ाना हो गया हूँ ।।

आसमां सो आसमां 

आस का तख़ल्लुस 

इच्छाओं का कारवाँ

आकांक्षाओं का समंदर 

अनुभूतियों का दिलबर 

चाहत है पाने की 

बस पगला सा गया हूँ 

इश्क़ में तेरे 

बेग़ाना हो गया हूँ ।।

एक हूँ अनेक हूँ 

कौन सी जग़ह बता 

जहां जहां नहीं हूँ 

तेरा साया हूँ 

मोहब्बत से आया हूँ 

मोहब्बत ही पीता हूँ 

मोहब्बत ही में जीता हूँ 

रोज़ भरता हूँ 

रोज़ पीता हूँ ।।

तुझे एय्य जिंदगी 

मैं रोज़ जीता हूँ ।। 

तुमसे नेहा लगा के 

   दीवाना हो गया हूँ ।। 


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drarunkumarshastri / एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त 


ओम ओम कर रे मना तेरी उमर निकलती जाये 

ओम ओम कर रे मना तेरी उमर निकलती जाये 

जे जग माया से भरा जे जग माया से भरा// 

देख देख ललचाय मति मोरी देख देख ललचाय 

जे जग माया से भरा 

देख देख ललचाय मति मोरी देख देख ललचाय 

ओम ओम कर रे मना तेरी उमर निकलती जाये 

ओम ओम कर रे मना तेरी उमर निकलती जाये 

पैदा होकर तुने भैय्या जो न जानी माया 

पैदा होकर तुने भैय्या जो न जानी माया 

लख चौरासी के चक्कर मा कनक जन्म गवाया 

पैदा होकर तुने भैय्या जो न जानी माया 

ओम ओम कर रे मना तेरी उमर निकलती जाये 

ओम ओम कर रे मना तेरी उमर निकलती जाये 

जे जग माया से भरा जे जग माया से भरा// 

देख देख ललचाय मति मोरी देख देख ललचाय 

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जिंदगी से जिंदगी लड़ने लगी है
आदमी को आदमी की शक्ल
अब क्यूँ इस तरह अखरने लगी है //

आँख में आँख का तिनका चुभेगा 

बात ये जिसने कही सही ही कही है //

आँख में अब तरक्कीयां चुभेंगीं तुम्हारी 

ये बात अब मुझको बेजा लगने  लगी है //

तेरी मेरी इस जात में फ़र्क़ क्या है 

इंसानियत इंसानियत से ये कहने लगी है // 

तू है गोरा मैं क्यूँ काला मैं हुँ सूंदर तू है भद्दा 

क़ाबलियत का पुलंन्दा या नाकारा //

छोटी छोटी बात पर आज तलवार क्यूँ 

अब हर जगह हर किसी में  तनने लगी है //

जिसको देखो आजकल  है वही
डूबा हुआ नफरत के गुरुर में 

                चार पैसे घूमता है लेके सुरूर में //

फिर वक्त के हाथों क्यों हवा निकली हुई है //

जिंदगी से जिंदगी लड़ने लगी है
आदमी को आदमी की शक्ल
अब क्यूँ इस तरह अखरने लगी है //

मैं चला उस रास्ते पर जो मुझे आया समझ //
मैं चला उस रास्ते पर जो मुझे आया समझ //
क्या उखाड़ा देख तेरा ये बता मुझको जजख़ //
शांति मेरी जिंदगी की अब भला बस, बेबस हुई
कद्रदानी आपसी इस कदर भौचक्क हुई  //
आपसी रंजिश में पड़ोसी, पडोसी लड़ पड़े
दुश्मनी इसे ही देख, भर भर पेट ख़ुशी हुई //  

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गुजरा साल 

भीगे बाल 

मन मुस्काया 

चित्र बनाया 

चित्र बना कर

 सृजन अकोरा

आत्म ज्ञान के 

शब्द बिखेरे

शब्द जो बिखरे

भाव थे निखरे 

उन भावों का

सपन सजाया 

तुम को देखा

उन सपनों में 

गुजरा साल 

भीगे बाल

मन मुस्काया

चित्र संजोया

उन चित्रों की 

छाया में  फिर

कविता लिख दी 

उस कविता का

लिए सहारा 

जीवन निकला

तुम न आईं 

गुजरा साल 

भीगे बाल 

मन मुस्काया 

चित्र बनाया ।।

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Tuesday, November 24, 2020

समय के अंतराळ में टिमटिमाती ज़िन्दगी / growing and weakening life with time

 समय के अंतराळ में  टिमटिमाती ज़िन्दगी / growing and weakening life with time 


             जिंदगी हमारी जिंदगी या तुम्हारी जिंदगी शुक्राणु - अण्डा के मिलन से अन्तिम श्वास पर्यन्त पल पल असमंजस से भरी है। क्या मैं क्या तुम सबने इसी प्रक्रिया से गुजरना है कोई अन्य रास्ता दुनिया के रचना कार ने न बनाया न कोई उपाय सुझाया। फिर भी मानव जी हाँ जीव जगत का सर्वाधिक विकसित शरीर व् दिमाग वाला मानव। जबसे प्रगट हुआ है इस प्रक्रिया से बचने की जुगत व् कुछ कुछ जुगाड़ में लगा हुआ है। उसने अनेकों तरीके खोज निकाले व् इस अहंकार से भरा इस दुनिया में विचरण करता रहा कि अब उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता इस दम्भ के चलते उसने सृष्टि के रचनाकार को ही चुनौती दे डाली। लेकिन विधना के आगे एक न चली।  ये एक ऐसी व्यवस्था है उस मालिक की के किसी भी सामाजिक परिवेश का मनुष्य हो [ शिक्षित- अशिक्षित, अमीर- गरीब , ६ इन्च का या १२ फुट का ब्रह्माण्ड के किसी भी भूभाग का प्राणी हो।  सब बेकार। सभी को ४ अवस्थाओं में से होकर गुजरना पड़ेगा उसके बाद जय राम जी की।  

                ये एक अकाट्य सत्य सब जानते हैं , जो चले गए , जो हैं और जो जाने वाले है।  फिर भी मानते नहीं। कोई विरला ही इस प्रकल्प को मान्यता देता है , अपने आगे पीछे की पीढीयों को समझता व् सम्मान देता है। किसी को कुछ बताने की सीखने सिखाने की आवश्यकता नहीं।  वो स्वयं के विवेक से संज्ञान से देखता सुनता सीखता रहता है , लेकिन मानता कोई विरला ही है निभाता कोई विशेष ही है। 

                मैं समूह के संचालक  सम्पादक महोदय / महोदया का आभार प्रगट करता हूँ उन्होंने इस अतिविशिष्ट समस्या को उठाया इस पर हमारे  संस्मरण  विचार आदि अपने समूह के माध्यम से मांगे।  

              मैं यहां गुजरात के एक परिवार का अपना संस्मरण रखता हूँ।  मैं उसी सोसइटी में २ माह के लिए रहता था।  एक दिन सुबह सुबह पोलिस साईरन की आवाज अपने सोसाइटी के कंपाउंड में सुन अचंभित सा घर से बाहर जो निकला तो झटका लगा के सामने के ब्लॉक के पार्किंग लौट के सामने कोई सड़क पे पड़ा है और पोलिस व् फॉरेंसिक विभाग के अधिकारी इन्वेस्टीगेशन व् सैंपल, फोटो आदि लेने  में व्यस्त हैं लोगों में दबी जुबान से खुसर फुसर चल रही , छोटे २ समूह में लोग एक दूसरे से ज्ञान का आदान प्रदान कर रहे हैं RWA के पदाधिकारी अपनी अतिविशेष भूमिका को निभा कर अपने दायित्व का निर्बहन कर रहे हैं।  

                      सड़क पे पड़ा मानव एक महिला है उसकी पहचान "" **** "" की माता जी के रूप में हो चुकी है।  [ "जिनको १ माह पहले वृद्धाश्रम से एक सामाजिक संस्था के दबाब के चलते मजबूरी में घर लाया गया था" ]  

                    पोलिस अफसर उनको / परिवार को  अलग से अपने घेरे में लेकर पूंछताछ करने लगी है।  

                मेरे अब तक के विवरण से आप सब समझ गए होंगे कि क्या हुआ फिर भी संक्षेप में।  एक बुजुर्ग महिला ७५ साल उम्र अपने ७ फ्लोर स्थित घर की बालकनी से नीचे गिरी व् इस दुर्घटना ? [ खुलासा बाद में ]  उनका स्वर्गवास हो गया। 

                    पोलिस अपनी कार्यवाही करके चली गई।  परिवार को सख़्त हिदायत दी गई आप हमसे पूछे बिना शहर से बाहर नहीं जाएंगे।  गेट पे एक पोलिस अफसर बिठा दिया गया। सी सी कैमरा फुटेज ले ली गई। 

                    ३ दिन बाद उन माता जी के लड़के व् बहु को अरेस्ट कर लिया गया।  

                    इस सम्पूर्ण संस्मरण का निचोड़ था आज कल संतान अपने बुजुर्ग माता पिता या अन्य रिश्तेदारों को झेलने से साफ़ कन्नी काट रही।  अपनी संकुचित परिवार प्रणाली में सीमित है [ ये इसलिए लिखा क्योकि प्यार तो मर ही गया सम्मान की तो आप भूल ही जाएं। 

                    खुलासा -  सी सी कैमरा फुटेज में साफ़ साफ़  माता जी के  बहु व् लड़का उनको अपनी बालकनी की ४ फुट की रेलिंग से गिराते हुए दिखाई दे रहे थे।    

                    *************************************************************** 

 

                        


Sunday, November 1, 2020

समूह के दैनिक कार्य ,दिन- दिनांक ‎Sunday, ‎November ‎1, ‎2020

 

भारत साहित्य संगम नारी शक्ति ऑनलाइन व्हाट्सप्प// फेसबुक समूह  दैनिक कार्य दिन ,  दिनांक ‎Sunday, ‎November ‎1, ‎2020


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हरियाणा स्थापना दिवस पर  हार्दिक स्वागत है ************





11/1/2020 🌸DR. ARUN KUMAR SHASTRI🌸: आवश्यक सूचना 🙏आज का दैनिक कार्य 🙏

विषय शब्द , 💐आदिभौतिक 💐 समय अभी से शाम 5 बजे तक आप किसी भी विधा में लिख सकते हैं लेकिन उक्त विषय का आपकी रचना में प्रयोग नितान्त वांछनीय । कृपया आप अपनी कोई भी पोस्ट विषय काल के बाद ही डालिये इस समय के बीच सिर्फ विषय युक्त पोस्ट आनी चाहिए। 🙏🕉️पटल का सम्मान हमारा सम्मान 🙏🕉️

🌸: विषय काल में कृपया विषय से इतर कोई पोस्ट न कीजिये** 

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    भारत साहित्य संगम नारी शक्ति ऑनलाइन व्हाट्सप्प// फेसबुक समूह  दैनिक कार्य दिन ,  दिनांक ‎Sunday, ‎November ‎1, ‎2020 ग्रुप की admin व प्रांतीय प्रमुख - कानपूर , उ. प्र .  आ सुनीता गुप्ता जी - ने आज ब्र्हन्न सम्मेलन में अपनी प्रतिभा के मुखर आयाम बिखेरे - व उपस्थित जनसमूह का मन मोह लिया |  सुनीता जी पटल आपके सम्मान से संमोहित है || 









आदरणीय महोदय एवं मंच को मेरा नमन
आज का विषय। आदि भौतिक
किसी भी प्रभाव से होने वाले कष्टि भौतिक दुखों में आते हैं। आदि भौतिक तीन प्रकार के प्रभाव में आते हैं। पहला दैविक , दूसरा दैः हिक और तीसरा भौतिक दुःख। यह तीनों दुख हमारे मानसिक शारीरिक सामाजिक कर्मों के फल हैं। ईश्वरीय नियम है कि हर मनुष्य सदाचारी जीवन बिताए और दूसरों को अनीति पर ना चलने के लिए पर भर सक यत्न करे। यह भौतिक दुर्घटनाएं सृष्टि के दोष नहीं हैं वर न अपने ही दोष है। अग्नि में तपा कर सोने की तरह हमें शुद्ध करने के लिए यह कष्ट बार-बार आया करते हैं। विश्व को चेतावनी या देकर जाते हैं। सभी मनुष्य अपने अपने कर्मों के प्रति उत्तरदायित्व रहे। ईश्वर ने हमें स्वतंत्रता दी है कि हम कौन सा मार्ग चुने, जोकि प्राय सभी चाहते हैं कि मोक्ष और मुक्ति का मार्ग। हमें विवेकपूर्ण सही मार्ग चुनना चाहिए और अपने जीवन की उन्नति करनी चाहिए। तभी सही मानो में आदि भौतिक का अर्थ सार्थक होगा।
धन्यवाद -- गीता ठाकुर दिल्ली से 🙏

दिनांक -1 नवंबर 2020 
विषय -आदि भौतिक 
 शीर्षक -आदि भौतिक
 विधा- कविता
             नश्वर
 आदि भौतिक है मानव काया,
 जिसको है, स्वायंभू ने  जाया।
धरती आकाश अग्नि वायु जल,
 पंच तत्वों से, निर्मित  है काया।
नश्वर है यह तन, अविनाशी नहीं,
 अविनाशी है, केवल सृष्टिकर्ता ही।
भौतिक परिवेशों में नए-नए रूप,
नित्य ही रखती है, अनश्वर आत्मा।
बदलते जिस तरह, वस्त्रों को हम,
कई योनियों में, बदलती है आत्मा।
अग्नि जला नहीं सकती,  उसको ,
 पवन भी उड़ा नहीं सकती,उसको ।
 सघन मेघ गला नहीं सकते उसको,
कोई शक्ति नहीं नियंत्रित करे उसको।
निश्चित अवधि के लिए धारण  करती,
जगमें विभिन्न आदिभौतिक रूपों को
समय आने पर"सक्षम" छोड़ती उनको
यही है आदिभौतिक नश्वरता का रूप,
चला आरहा युगों से लिए नए स्वरूप।
 यह सृष्टि,ब्रह्मांड सभी आदिभौतिक,
 नहीं है इनमें ,कुछ भी पारलौकिक।
जग का कण-कण आदिभौतिक है,
दिखता हमें सभी कुछ काल्पनिक है

 श्रीमती गायत्री ठाकुर "सक्षम"  नरसिंहपुर ,मध्य प्रदेश


*विषय:- आदि भौतिक
*शीर्षक:- आदि भौतिक
*विधा :- मुक्तक
*दिन:- रविवार
*तिथि :- ०१-११-२०२०
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भूमि,गगन,वायु,अग्नि और मिलता है जब नीर।
आदि भौतिक तत्वों से मिलकर बना मानव शरीर।
तन-मंदिर की आत्मज्योति ही अमर ज्योति,प्राण हैं,
ये तन जग में एक पहचान है,नहीं किसी की जागीर।।

प्रतिभा तिवारी लखनऊ 🙏



आ0 महोदय जी व पटल पर उपस्थित सभी को आज का विषय सरल नहीं है फिर जो भी समझ में आया वो आप सब के समक्ष संक्षिप्त रुप में। आदिभौतिक भौतिक क्या है ? प्रकृति का वह रूप जिसका जड़त्व परिभाषित हो जाता है या जानने में आ जाता है  भौतिक कहलाता है । आधुनिक समय में मानव ने प्रत्येक असम्भव कार्य कर दिखाएं हैं जिसका आदिकाल में साधारण मानव कल्पना भी नहीं कर सकता था । परन्तु आदि काल में भी मानव ने अपनी सूझ-बुझ अनुसार यथाशक्ति कार्य किए हैं । जैसा कि जगविदित है हमारे पूर्वजों ने काल अनुसार भौतिक ज्ञान प्राप्त किया। जैसा कि उन्होंने खुले में ना रहकर गुफाओं में रहना आरम्भ किया, पत्थरों के औजारों से शिकार करना, आग जलाना, कच्चे माँस को भुन कर खाना , पत्थरों से घर बनाना ,खेती -बाड़ी आरम्भ करना,पशु पालना, कपास तथा ऊन से वस्त्रों का निर्माण करना,लकड़ी का प्रयोग करना तथा पहिए से लेकर फर्नीचर बनाने तक का अविष्कार पहले ही हो चुका था । अपने बुद्धि बल के विकास से मानव ने पर्वतों की ऊँचाई से सागर की गहराई ,धरती की लम्बाई -चौड़ाई से सागर को माप लिया है  ।यातायात के प्रत्येक तीव्र गति के वाहनों का अविष्कार किया ।अन्तरिक्ष की दूरियाँ जानी खगौलिय सैर की,अस्त्र-शस्त्रों को बहुविधियों से तैयार किया । आदि काल में भी हमारे महार्षि शक्तियों से परिपूर्ण विभिन्न क्षेत्रों में महाविज्ञानिक हुए हैं । अधिक जानकारी तो नहीं है परन्तु मैं कुछ विज्ञानिकों का उल्लेख करती हुं ।जैसे आर्यभट्ट तथा भास्कर महान गणितज्ञ एवं ज्योतिषिचार्य हुए हैं धन्वतरी, सुश्रुत,चरक यह महार्षि महान चिकित्सक एवं शल्य चिकित्सक हुए हैं । महार्षि कणाद परमाणु शस्त्र के तथा महार्षि बोधायन गणित के महाविज्ञानिक हुए है ।  भौतिक प्रकृति की वह गोद है जहाँ मानव विभिन्न प्रकार के अविष्कार करके तथा उनका भोग करके वहीं सो जाता है ।
*ललिता कश्यप सायर डोभा  जिला बिलासपुर ( हि0 प्र0)*

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आज के विषय से इतर प्रोग्राम के उपरांत आई रचनाये व सम्मान आदि  शाम  ५.३० के बाद 

कभी खिड़कियों पर कभी दहलीज पर जाकने आते हो
चाँद की तर्ह तुम बादलों के बीच रह कर बड़ा शर्माते हो 

ख्वाबो में परीया तो कभी फरिश्ते के रूप में तुम आते हो
क्या पागल हो की चंचल मन लिए तुम हमे बड़ा तड़पाते हो 

नादानियाँ ये हरकतें  करके तुम क्या जताना चाहते हो 
जुबा से बड़ा गभरते हो लेकिन आखों से फस जाते हो

दूर नहीं रह सकते एक पल फिर क्यो इतना उलझ रहे हो
फसलों के बीच जी नही सकते फिर दूरिया क्यों बना रहे हो

कलम से इतना गुस्सा क्यो कागज़ पर उतार रहे हो
बहुत हुई बहस हमारी बात  तुम  क्यो नही मान रहे हो ------नीक राजपूत     गुजरात

समाज और साहित्य

 आज का जो विषय है वास्तव में यह हमारे समाज का मूल आधार है। हम लोग वैसा ही जीवन यापन वैसी ही आदत अपने अंदर विकसित करने का प्रयास करते हैं जो हम साहित्य में पढ़ते हैं सुनते हैं या पूर्वजों द्वारा मुझे प्राप्त होता है। साहित्य ही वह धारा है जो समाज को अच्छाई की ओर अथवा बुराई की ओर बहा ले जाती है। यदि अच्छा साहित्य मिल जाता है जिसमें मानवता, ईमानदारी, वासुदेव कुटुंबकम तथा अन्य अच्छाइयां होती हैं तो लोग उस साहित्य को पढ़कर उसका अनुसरण करने का प्रयास करते हैं। और एक अच्छे समाज का निर्माण होता है। वहीं यदि साहित्य इसके विपरीत प्राप्त होता है तो उसका प्रभाव भी समाज पर नकारात्मक पड़ता है। आजकल समाज में जो बुराइयां फैल रही है उसका बहुत कुछ कारण आज सस्ती लोकप्रियता के लिए फैल रहा साहित्य भी है जो कुछ प्रतिशत साहित्यकारों द्वारा ही लिखा जाता है परंतु प्रभावित सारे साहित्य जगत को करता है और समाज के लिए एक खतरा बन जाता है हम सभी को बहुत ही गंभीरता से ऐसे साहित्य का सृजन करना चाहिए जिसमें मानव मूल्यों को समाहित करते हुए एक अच्छे समाज की कल्पना की गई हो यदि सभी साहित्यकार इस प्रकार के सृजन को सृजित करने लग जाएंगे तो निश्चय ही एक अच्छे समाज की सार्थक परिकल्पना हम कर सकते हैं हम सभी साहित्यकार ही एक अच्छे समाज के जनक होते हैं।।

 हो सकता है मेरे कुछ बातों से कुछ साथी सहमत ना हो परंतु यह मेरे अपने विचार हैं जिन्हें मैं अच्छा समझता हूं और एक समाज के लिए आवश्यक भी समझता हूं।  धन्यवाद   ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम कानपुर नगर


विषय.. जीवन है उत्सव
*******

जीवन को यदि एक उत्सव मान
के खुशी संग जिया जाऐगा।।
तो ही तू इंसा हर दुख से लड़ के
तू हर बार भी मुस्काऐगा।।

रोज़ समझ दिन एक उत्सव है
खुशहाल जीवन मे बहा चला जाऐगा।।
कोई भी परेशानी आऐगी तो वो
खेल समझ खेलते हुए सुलझा तू जाऐगा।।

तेरा स्वभाव मधुर खिलखिलाता सभी
को सच भाऐगा।।
सभी के लिये प्रेरणा बन तू सितारों की
तरह सच जगमगाऐगा।।

जीवन है उत्सव ये गांठ बांध ले तू तो 
तू तेरे संग वातावरण भी महक जाऐगा।।  वीना आडवानी  नागपुर, महाराष्ट्र  *****


दीप शिखा ......

रागा रुण हो झूमती रहती है । 
दीपशिखा जलती है ।।
घोर अमावस रात की 
तम सारा हरती है।।

महल अट्टारी झोपड़ी देहरी 
हर्षित हो पलती है।
एक सा है प्रकाश भरती 
कोई, भेद नहीं करती है।।

मंगलाचरण, द्वाराचार कर 
घर-घर यह जगती है।
मानवता का दे संदेशा 
स्वयं जल कर चुकती है।।

दीपक में तेल औ बाती 
सृष्टी हम रहती है ।
प्रेम ज्योति का दृष्टी बाले -
पथ रोशन करती है।।

ज्योति नारायण 
1/11/20


अनुनासिक शब्द चमत्कार


चाँद पुकारे चंदनिया को
    हँसी चाँदनी लख नेह को।

हँसिनी मैं तेरी ओ प्रिय,
अंग लगा लो अब प्रिय।

उंगलियों में तेरा रोताचेहरा है,
अँगूठा पौंछता आँसूओ को है।


ढंग बेढंग हो गये रँग बेरंग,
मस्त मलंग न कर तंग संग।


कुंतल घने अलके खिली है,
कुंडलियां जागरण हुई है।

कुँअर मेरे साँवरे हुई बावरी सी,
सँवर गयी जिंदगी देहकली हँसी।

सुंदर सुखमय सजीला हो मीत।
अंगूर नारँगी आँवला भाये मीत।


अंक में आ गिरी तेरे विरहन वो।
छोड़ चला गया जिसे ढूँढती रो।


पलँग पे धरा के फूल बिखर गए,
भँवरेकलियों को मदमस्त कर गए।

बाँसुरी बजी वंशीवट तले मोहन।
काँधे लगी काँपती राधे हुई मगन।

बंद है मंदिर मूरत न दिखी कान्हा।
कुंदन सी कुंवारी तरसे देख आ ना।


सखियाँ अखियाँ चहूँ दिश फेरे हैं।
दुखियाँ सुखियाँ पँखिया घनेरे है।

चँचल चँवर डुलाती चितचोर कली
कँवर कान्हा रस पूँजी मुरली भली।

स्वरचित  श्रीमती नीलम व्यास





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सम्पादकीय - आजके विषय व विषय के उपरांत दोनो मंचो को सम्मिलित प्रस्तुती स्पंदन के pdf - ब्लोग के मध्यम से आपके समक्ष -

ये विषय इसलिये कठिन था क्युकी ये गुगल देव की ३६० degree   location में नही था - आज मानव गुगळ देव की कृपा छत्र छाया के बिना सांस भी नही ले सकता आने वाली संतांन कैसी होंगी ये सिर्फ गुगळ देव ही प्रकाशित कर सकते -खैर /// 

आदि - अर्थात आदिकाल से 
भौतिक अर्थात - पंचमहाभूत 

अब इतना लिखने के बाद इन दोनो शब्दो के मिश्रित भाव को समझा जा सकता है और इसके अंदर निहित भाव का मेहती ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है मैने इसको इसलिये दिया था की आप शायद अपने प्राकृत भाव से जुडे है और बेहतरीन रचनाये लेकर 
*आये 

लेकिन ऐसा हो न सका **

सोचता था सोचना तो काम है मेरा 
सोचता था सोचना तो काम है मेरा 
लेकिन करतार ने वो होने न दिया//
इक युग बदल गया और आज का
भी दिन उसी के साथ  जुड गया //
काम थे कई मंजर बदल गया
सोचा था बहुत कुछ  मगर वैसा
कुछ कुछ,  ऐसा,  हो न सका  // 
 

***********************एक अबोध बालक - अरुण अतृप्त *************************






Saturday, October 31, 2020

अजय पंकज की पोस्ट से 

चौथ_माता 

बचपन में परिवार के साथ माँ के दरबार में दर्शन करने जाता था,आज पहली बार दोस्तों के साथ माँ के दरबार में जाने का अवसर मिला ।
बचपन यही कोई 8-9 साल का रहा होगा में ।
हमारी हीरो हौंडा बाइक पे टोंक शहर से माँ के दर्शन के लिए जाया करते थे ।
मुझे आज भी याद है ,में बाइक पे आगे बैठा करता था,
माँ के दर्शन की उत्सुकता इतनी होती थी ,की
नंगे पैर ,धुप में सीढ़िया पे इतनी तेजी से चढ़ जाता था ।
परिवार वाले पीछे रह जाते थे।

जब माता जी के मन्दिर का निर्माण कार्य चल रहा था ,तब में रेत के दो छोटे छोटे कट्टे ऊपर तक लेकर गया था,
आज जब में दोस्तों के साथ था तो मुझे ये सौभाग्य फिर से मिला
आज माँ के मंदिर में फाइबर की सीट्स लग गयी है,
जिससे भक्तो को ऊपर तक जाने में दिक्कत नही आती।
जब ऊपर माँ के दरबार में पहुँचा तो ,सुकून मिला
माँ ने जो बुलाया था ।
मेरी माँ चौथ माँ 🙏
चौथ का बरवाड़ा का सम्पूर्ण इतिहास चौथ माता शक्ति पीठ के इर्द गिर्द घूमता है, इस गाँव में चौथ भवानी का भव्य मंदिर है जो अरावली शक्ति गिरि पहाड़ श्रृंखला के ऊपर 1100 फीट की ऊँचाई पर स्थित है, इस मंदिर की स्थापना महाराजा भीमसिंह चौहान ने संवत 1451 में बरवाड़ा के पहाड़ पर की। वर्तमान चौथ का बरवाड़ा को प्राचीन काल में "बाड़बाड़ा" नाम से जाना जाता था जो कि रणथम्भौर साम्राज्य का ही एक हिस्सा रहा है, इस क्षेत्र के प्रमुख शासकों में बीजलसिंह एवं भीमसिंह चौहान प्रमुख रहे हैं।
बरवाड़ा क्षेत्र के पास चौरू एवं पचाला जो कि वर्तमान में गाँव बन गए हैं वो प्राचीन काल में घनघौर जंगलों में आदिवासियों के ठहरने के प्रमुख स्थल थे। चौथ माता की प्रथम प्रतिमाका अनुमान चौरू जंगलों के आसपास माना जाता है। एक किंवदंती के अनुसार कहाँ जाता है कि प्राचीन काल में चौरू जंगलों में एक भयानक अग्नि पुंज का प्राक्ट्य हुआ, जिससे दारूद भैरो का विनाश हुआ था। इस प्रतिमा के चमत्कारों को देखकर जंगल के आदिवासियों को प्रतिमा के प्रति लगाव हो गया और उन्होंने अपने कुल के आधार पर चौर माता के नाम से इसकी पूजा करने लगे, बाद मे चौर माता का नाम धीरे धीरे चौरू माता एवं आगे चलकर यही नाम अपभ्रंश होकर चौथ माता हो गया।

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हम सब खतरे में हैं सावधान 

एक चूहा किसान के घर में बिल बना कर रहता था. एक दिन चूहे ने देखा कि किसान और उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं. चूहे ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है.
उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक चूहेदानी थी. ख़तरा भाँपने पर उस ने पिछवाड़े में जा कर कबूतर को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गयी है.
कबूतर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या? मुझे कौनसा उस में फँसना है?
निराश चूहा ये बात मुर्गे को बताने गया.
मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा... जा भाई..ये मेरी समस्या नहीं है.
हताश चूहे ने बाड़े में जा कर बकरे को ये बात बताई... और बकरा हँसते हँसते लोटपोट होने लगा
.
उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई जिस में एक ज़हरीला साँप फँस गया था.
अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर किसान की पत्नी ने उसे निकाला और साँप ने उसे डंस लिया.
तबीयत बिगड़ने पर किसान ने वैद्य को बुलवाया. वैद्य ने उसे कबूतर का सूप पिलाने की सलाह दी.
कबूतर अब पतीले में उबल रहा था.
खबर सुनकर किसान के कई रिश्तेदार मिलने आ पहुँचे जिनके भोजन प्रबंध हेतु अगले दिन मुर्गे को काटा गया.
कुछ दिनों बाद किसान की पत्नी मर गयी... अंतिम संस्कार और मृत्यु भोज में बकरा परोसने के अलावा कोई चारा न था......
चूहा दूर जा चुका था...बहुत दूर ...........
अगली बार कोई आप को अपनी समस्या बातये और आप को लगे कि ये मेरी समस्या नहीं है तो रुकिए और दुबारा सोचिये.... हम सब खतरे में हैं...
समाज का एक अंग, एक तबका, एक नागरिक खतरे में है तो पूरा देश खतरे में है....
जाति पाती के दायरे से बाहर निकलिये.
स्वयंम तक सीमित मत रहिये. . 
समाजिक बनिये...
और राष्ट्र धर्म निभाएं 


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मै अघोरी तू अघोरी

  एक रोटी की चटोरी 

 नन्ही सी ये जान मेरी 

 पूछ् क्या है पूछना 

एय जगत  कर्म का धर्म का न्याय का 

 कर सुनिश्चित सर्व प्रथम एक रोटी 

  कर सुनिश्चित सर्व प्रथम एक रोटी 

 बात करना बाद में 

मुझसे नोगोडी

   मै अघोरी तू अघोरी  

एक रोटी की चटोरी 

 नन्ही सी ये जान मेरी 

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admin / editorial /at the closer of the day 31102020 


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एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त 


प्राण तो रहने ही हैं  - अपरिचित 

देह की ही होती है कोई पहचान 


नेह प्राण से भी कोई करता है 

ये वो सब कोई जानता है 

देह तक ही रहती है प्रीती समर्पित 



प्राण तो रहने ही हैं  - अपरिचित 


मन मनुज मरुथळ,  अरु  निरर्थक 

वेदना कण्टक कान्ती विरूपित 


प्राण तो रहने ही हैं  - अपरिचित 


शब्द मध्यम शब्द माध्यम 

शब्द भाषा के लिये, हैं बने 

सत्य सार्थक , काव्य कल्पित 


प्राण तो रहने ही हैं  - अपरिचित 

प्राण तो रहने ही हैं  - अपरिचित 



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एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त