admin / editorial /at the closer of the day 31102020
drarunkumarshastri
एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त
प्राण तो रहने ही हैं - अपरिचित
देह की ही होती है कोई पहचान
नेह प्राण से भी कोई करता है
ये वो सब कोई जानता है
देह तक ही रहती है प्रीती समर्पित
प्राण तो रहने ही हैं - अपरिचित
मन मनुज मरुथळ, अरु निरर्थक
वेदना कण्टक कान्ती विरूपित
प्राण तो रहने ही हैं - अपरिचित
शब्द मध्यम शब्द माध्यम
शब्द भाषा के लिये, हैं बने
सत्य सार्थक , काव्य कल्पित
प्राण तो रहने ही हैं - अपरिचित
प्राण तो रहने ही हैं - अपरिचित
drarunkumarshastri
एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त

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