Saturday, October 31, 2020

अजय पंकज की पोस्ट से 

चौथ_माता 

बचपन में परिवार के साथ माँ के दरबार में दर्शन करने जाता था,आज पहली बार दोस्तों के साथ माँ के दरबार में जाने का अवसर मिला ।
बचपन यही कोई 8-9 साल का रहा होगा में ।
हमारी हीरो हौंडा बाइक पे टोंक शहर से माँ के दर्शन के लिए जाया करते थे ।
मुझे आज भी याद है ,में बाइक पे आगे बैठा करता था,
माँ के दर्शन की उत्सुकता इतनी होती थी ,की
नंगे पैर ,धुप में सीढ़िया पे इतनी तेजी से चढ़ जाता था ।
परिवार वाले पीछे रह जाते थे।

जब माता जी के मन्दिर का निर्माण कार्य चल रहा था ,तब में रेत के दो छोटे छोटे कट्टे ऊपर तक लेकर गया था,
आज जब में दोस्तों के साथ था तो मुझे ये सौभाग्य फिर से मिला
आज माँ के मंदिर में फाइबर की सीट्स लग गयी है,
जिससे भक्तो को ऊपर तक जाने में दिक्कत नही आती।
जब ऊपर माँ के दरबार में पहुँचा तो ,सुकून मिला
माँ ने जो बुलाया था ।
मेरी माँ चौथ माँ 🙏
चौथ का बरवाड़ा का सम्पूर्ण इतिहास चौथ माता शक्ति पीठ के इर्द गिर्द घूमता है, इस गाँव में चौथ भवानी का भव्य मंदिर है जो अरावली शक्ति गिरि पहाड़ श्रृंखला के ऊपर 1100 फीट की ऊँचाई पर स्थित है, इस मंदिर की स्थापना महाराजा भीमसिंह चौहान ने संवत 1451 में बरवाड़ा के पहाड़ पर की। वर्तमान चौथ का बरवाड़ा को प्राचीन काल में "बाड़बाड़ा" नाम से जाना जाता था जो कि रणथम्भौर साम्राज्य का ही एक हिस्सा रहा है, इस क्षेत्र के प्रमुख शासकों में बीजलसिंह एवं भीमसिंह चौहान प्रमुख रहे हैं।
बरवाड़ा क्षेत्र के पास चौरू एवं पचाला जो कि वर्तमान में गाँव बन गए हैं वो प्राचीन काल में घनघौर जंगलों में आदिवासियों के ठहरने के प्रमुख स्थल थे। चौथ माता की प्रथम प्रतिमाका अनुमान चौरू जंगलों के आसपास माना जाता है। एक किंवदंती के अनुसार कहाँ जाता है कि प्राचीन काल में चौरू जंगलों में एक भयानक अग्नि पुंज का प्राक्ट्य हुआ, जिससे दारूद भैरो का विनाश हुआ था। इस प्रतिमा के चमत्कारों को देखकर जंगल के आदिवासियों को प्रतिमा के प्रति लगाव हो गया और उन्होंने अपने कुल के आधार पर चौर माता के नाम से इसकी पूजा करने लगे, बाद मे चौर माता का नाम धीरे धीरे चौरू माता एवं आगे चलकर यही नाम अपभ्रंश होकर चौथ माता हो गया।

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हम सब खतरे में हैं सावधान 

एक चूहा किसान के घर में बिल बना कर रहता था. एक दिन चूहे ने देखा कि किसान और उसकी पत्नी एक थैले से कुछ निकाल रहे हैं. चूहे ने सोचा कि शायद कुछ खाने का सामान है.
उत्सुकतावश देखने पर उसने पाया कि वो एक चूहेदानी थी. ख़तरा भाँपने पर उस ने पिछवाड़े में जा कर कबूतर को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गयी है.
कबूतर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या? मुझे कौनसा उस में फँसना है?
निराश चूहा ये बात मुर्गे को बताने गया.
मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा... जा भाई..ये मेरी समस्या नहीं है.
हताश चूहे ने बाड़े में जा कर बकरे को ये बात बताई... और बकरा हँसते हँसते लोटपोट होने लगा
.
उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई जिस में एक ज़हरीला साँप फँस गया था.
अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर किसान की पत्नी ने उसे निकाला और साँप ने उसे डंस लिया.
तबीयत बिगड़ने पर किसान ने वैद्य को बुलवाया. वैद्य ने उसे कबूतर का सूप पिलाने की सलाह दी.
कबूतर अब पतीले में उबल रहा था.
खबर सुनकर किसान के कई रिश्तेदार मिलने आ पहुँचे जिनके भोजन प्रबंध हेतु अगले दिन मुर्गे को काटा गया.
कुछ दिनों बाद किसान की पत्नी मर गयी... अंतिम संस्कार और मृत्यु भोज में बकरा परोसने के अलावा कोई चारा न था......
चूहा दूर जा चुका था...बहुत दूर ...........
अगली बार कोई आप को अपनी समस्या बातये और आप को लगे कि ये मेरी समस्या नहीं है तो रुकिए और दुबारा सोचिये.... हम सब खतरे में हैं...
समाज का एक अंग, एक तबका, एक नागरिक खतरे में है तो पूरा देश खतरे में है....
जाति पाती के दायरे से बाहर निकलिये.
स्वयंम तक सीमित मत रहिये. . 
समाजिक बनिये...
और राष्ट्र धर्म निभाएं 


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www.drarunkumarshastri  एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त  

मै अघोरी तू अघोरी

  एक रोटी की चटोरी 

 नन्ही सी ये जान मेरी 

 पूछ् क्या है पूछना 

एय जगत  कर्म का धर्म का न्याय का 

 कर सुनिश्चित सर्व प्रथम एक रोटी 

  कर सुनिश्चित सर्व प्रथम एक रोटी 

 बात करना बाद में 

मुझसे नोगोडी

   मै अघोरी तू अघोरी  

एक रोटी की चटोरी 

 नन्ही सी ये जान मेरी 

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admin / editorial /at the closer of the day 31102020 


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एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त 


प्राण तो रहने ही हैं  - अपरिचित 

देह की ही होती है कोई पहचान 


नेह प्राण से भी कोई करता है 

ये वो सब कोई जानता है 

देह तक ही रहती है प्रीती समर्पित 



प्राण तो रहने ही हैं  - अपरिचित 


मन मनुज मरुथळ,  अरु  निरर्थक 

वेदना कण्टक कान्ती विरूपित 


प्राण तो रहने ही हैं  - अपरिचित 


शब्द मध्यम शब्द माध्यम 

शब्द भाषा के लिये, हैं बने 

सत्य सार्थक , काव्य कल्पित 


प्राण तो रहने ही हैं  - अपरिचित 

प्राण तो रहने ही हैं  - अपरिचित 



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एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त