डॉ अरुण कुमार शास्त्री
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एक अबोध बालक ** अरुण अतृप्त
रोज़ भरता हूँ
रोज़ पीता हूँ ।।
तुझे एय्य जिंदगी
मैं रोज़ जीता हूँ ।।
तुमसे नेहा लगा के
दीवाना हो गया हूँ ।।
इश्क़ में तेरे
बेग़ाना हो गया हूँ ।।
आसमां सो आसमां
आस का तख़ल्लुस
इच्छाओं का कारवाँ
आकांक्षाओं का समंदर
अनुभूतियों का दिलबर
चाहत है पाने की
बस पगला सा गया हूँ
इश्क़ में तेरे
बेग़ाना हो गया हूँ ।।
एक हूँ अनेक हूँ
कौन सी जग़ह बता
जहां जहां नहीं हूँ
तेरा साया हूँ
मोहब्बत से आया हूँ
मोहब्बत ही पीता हूँ
मोहब्बत ही में जीता हूँ
रोज़ भरता हूँ
रोज़ पीता हूँ ।।
तुझे एय्य जिंदगी
मैं रोज़ जीता हूँ ।।
तुमसे नेहा लगा के
दीवाना हो गया हूँ ।।
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drarunkumarshastri / एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त
ओम ओम कर रे मना तेरी उमर निकलती जाये
ओम ओम कर रे मना तेरी उमर निकलती जाये
जे जग माया से भरा जे जग माया से भरा//
देख देख ललचाय मति मोरी देख देख ललचाय
जे जग माया से भरा
देख देख ललचाय मति मोरी देख देख ललचाय
ओम ओम कर रे मना तेरी उमर निकलती जाये
ओम ओम कर रे मना तेरी उमर निकलती जाये
पैदा होकर तुने भैय्या जो न जानी माया
पैदा होकर तुने भैय्या जो न जानी माया
लख चौरासी के चक्कर मा कनक जन्म गवाया
पैदा होकर तुने भैय्या जो न जानी माया
ओम ओम कर रे मना तेरी उमर निकलती जाये
ओम ओम कर रे मना तेरी उमर निकलती जाये
जे जग माया से भरा जे जग माया से भरा//
देख देख ललचाय मति मोरी देख देख ललचाय
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जिंदगी से जिंदगी लड़ने लगी है
आदमी को आदमी की शक्ल
अब क्यूँ इस तरह अखरने लगी है //
आँख में आँख का तिनका चुभेगा
बात ये जिसने कही सही ही कही है //
आँख में अब तरक्कीयां चुभेंगीं तुम्हारी
ये बात अब मुझको बेजा लगने लगी है //
तेरी मेरी इस जात में फ़र्क़ क्या है
इंसानियत इंसानियत से ये कहने लगी है //
तू है गोरा मैं क्यूँ काला मैं हुँ सूंदर तू है भद्दा
क़ाबलियत का पुलंन्दा या नाकारा //
छोटी छोटी बात पर आज तलवार क्यूँ
अब हर जगह हर किसी में तनने लगी है //
जिसको देखो आजकल है वही
डूबा हुआ नफरत के गुरुर में
चार पैसे घूमता है लेके सुरूर में //
फिर वक्त के हाथों क्यों हवा निकली हुई है //
जिंदगी से जिंदगी लड़ने लगी है
आदमी को आदमी की शक्ल
अब क्यूँ इस तरह अखरने लगी है //
मैं चला उस रास्ते पर जो मुझे आया समझ //
मैं चला उस रास्ते पर जो मुझे आया समझ //
क्या उखाड़ा देख तेरा ये बता मुझको जजख़ //
शांति मेरी जिंदगी की अब भला बस, बेबस हुई
कद्रदानी आपसी इस कदर भौचक्क हुई //
आपसी रंजिश में पड़ोसी, पडोसी लड़ पड़े
दुश्मनी इसे ही देख, भर भर पेट ख़ुशी हुई //
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गुजरा साल
भीगे बाल
मन मुस्काया
चित्र बनाया
चित्र बना कर
सृजन अकोरा
आत्म ज्ञान के
शब्द बिखेरे
शब्द जो बिखरे
भाव थे निखरे
उन भावों का
सपन सजाया
तुम को देखा
उन सपनों में
गुजरा साल
भीगे बाल
मन मुस्काया
चित्र संजोया
उन चित्रों की
छाया में फिर
कविता लिख दी
उस कविता का
लिए सहारा
जीवन निकला
तुम न आईं
गुजरा साल
भीगे बाल
मन मुस्काया
चित्र बनाया ।।
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