drarunkumarshastri // एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त
माथा ख़राब है अजि मेरा माथा ख़राब हैमुझसे मत उलझना मेरा मन बेताब है।।
जबसे हुआ हूँ पैदा मैं जिंदगी से लड़ रहा
अपने पूर्व कर्म का मैं हिसाब सब दे रहा।।
जानता हूँ पागल नहीं हूँ प्रारब्द्ध की दिशा
क्या किये थे कार्य अज्ञान से तब न था पता
मन व्चन और कर्म का बेढव हिसाब है
माथा ख़राब है अजि मेरा माथा ख़राब है।।
फेरिस्त क्या करेगी मुआफ़ी भी न मिलेगी
भुगतूँगा सिलसिले से अब ये ही अजाब है
माथा ख़राब है अजि मेरा माथा ख़राब है
मुझसे मत उलझना मेरा मन बेताब है।।
उल्फ़त के लुत्फ़ का साहिब स्वाद है गज़ब
जिसने चख़ा नहीं , तो वो शख़्स है अज़ब।।
एक एक पल मेहबूब के साथ का देता बड़ा मज़ा
हैरान क्यूँ है अब जो तुझको मिल रही सज़ा।।
माथा ख़राब है अजि मेरा माथा ख़राब है
मुझसे मत उलझना मेरा मन बेताब है।।
*बालक अबोध हूँ, मैं, मुझको तो होश ही नहीं
कर दिया सो कर दिया, अब सोचता हूँ क्या।।
एक एक
जो जो
# औरत हुँ मैं #
औरत हुँ मैं
सृष्टि के रचनाकार की
सर्वोतम कृति
क्युं बाँधते हो मुझको
भिन्न भिन्न अलंकारों से
मूल में जिसके मिलूंगी तो
मैं ही
औरत हुँ मैं
सृष्टि के रचनाकार की
सर्वोतम कृति
सौन्दर्य, शुचिता, ममत्व आदि
तो गुण हैं गौण
जो मिले मुझे
विधाता के आसीस सम
औरत हुँ मैं
सृष्टि के रचनाकार की
सर्वोतम कृति
मैं नही चाहती कि मुझे कोई
देवी बना दे
मैं नही चाहती कि मुझे कोई
कि तुम मुझे दुलारो
सखा बन के
जीने दो मुझे अपना जीवन
बस स्वतंत्र रह के
बांधो मत बन्धन में
अपवादों के
औरत हुँ मैं
सृष्टि के रचनाकार की
सर्वोतम कृति
क्युं बाँधते हो मुझको
भिन्न भिन्न अलंकारों से
मूल में जिसके मिलूंगी तो
मैं ही
हाँ बहुत प्रेम उपजे यदि तुम्हारे हृदय में
जब भी
तो बस एक ही बात का
रखना तुम ख्याल
कभी ठोकर न लगाना
मेरी अस्मिता को
न करना इसको अपनी
बद्तामिजियों से बदहाल
जी न सकूंगी खो कर अपना
आत्मसम्मान
औरत हुँ मैं
सृष्टि के रचनाकार की
सर्वोतम कृति