भारत साहित्य संगम नारी शक्ति ऑनलाइन व्हाट्सप्प// फेसबुक समूह दैनिक कार्य दिन , दिनांक Sunday, November 1, 2020
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11/1/2020 🌸DR. ARUN KUMAR SHASTRI🌸: आवश्यक सूचना 🙏आज का दैनिक कार्य 🙏
विषय शब्द , 💐आदिभौतिक 💐 समय अभी से शाम 5 बजे तक आप किसी भी विधा में लिख सकते हैं लेकिन उक्त विषय का आपकी रचना में प्रयोग नितान्त वांछनीय । कृपया आप अपनी कोई भी पोस्ट विषय काल के बाद ही डालिये इस समय के बीच सिर्फ विषय युक्त पोस्ट आनी चाहिए। 🙏🕉️पटल का सम्मान हमारा सम्मान 🙏🕉️
🌸: विषय काल में कृपया विषय से इतर कोई पोस्ट न कीजिये**
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भारत साहित्य संगम नारी शक्ति ऑनलाइन व्हाट्सप्प// फेसबुक समूह दैनिक कार्य दिन , दिनांक Sunday, November 1, 2020 ग्रुप की admin व प्रांतीय प्रमुख - कानपूर , उ. प्र . आ सुनीता गुप्ता जी - ने आज ब्र्हन्न सम्मेलन में अपनी प्रतिभा के मुखर आयाम बिखेरे - व उपस्थित जनसमूह का मन मोह लिया | सुनीता जी पटल आपके सम्मान से संमोहित है ||
आदरणीय महोदय एवं मंच को मेरा नमन
आज का विषय। आदि भौतिक
किसी भी प्रभाव से होने वाले कष्टि भौतिक दुखों में आते हैं। आदि भौतिक तीन प्रकार के प्रभाव में आते हैं। पहला दैविक , दूसरा दैः हिक और तीसरा भौतिक दुःख। यह तीनों दुख हमारे मानसिक शारीरिक सामाजिक कर्मों के फल हैं। ईश्वरीय नियम है कि हर मनुष्य सदाचारी जीवन बिताए और दूसरों को अनीति पर ना चलने के लिए पर भर सक यत्न करे। यह भौतिक दुर्घटनाएं सृष्टि के दोष नहीं हैं वर न अपने ही दोष है। अग्नि में तपा कर सोने की तरह हमें शुद्ध करने के लिए यह कष्ट बार-बार आया करते हैं। विश्व को चेतावनी या देकर जाते हैं। सभी मनुष्य अपने अपने कर्मों के प्रति उत्तरदायित्व रहे। ईश्वर ने हमें स्वतंत्रता दी है कि हम कौन सा मार्ग चुने, जोकि प्राय सभी चाहते हैं कि मोक्ष और मुक्ति का मार्ग। हमें विवेकपूर्ण सही मार्ग चुनना चाहिए और अपने जीवन की उन्नति करनी चाहिए। तभी सही मानो में आदि भौतिक का अर्थ सार्थक होगा।
धन्यवाद -- गीता ठाकुर दिल्ली से 🙏
दिनांक -1 नवंबर 2020
विषय -आदि भौतिक
शीर्षक -आदि भौतिक
विधा- कविता
नश्वर
आदि भौतिक है मानव काया,
जिसको है, स्वायंभू ने जाया।
धरती आकाश अग्नि वायु जल,
पंच तत्वों से, निर्मित है काया।
नश्वर है यह तन, अविनाशी नहीं,
अविनाशी है, केवल सृष्टिकर्ता ही।
भौतिक परिवेशों में नए-नए रूप,
नित्य ही रखती है, अनश्वर आत्मा।
बदलते जिस तरह, वस्त्रों को हम,
कई योनियों में, बदलती है आत्मा।
अग्नि जला नहीं सकती, उसको ,
पवन भी उड़ा नहीं सकती,उसको ।
सघन मेघ गला नहीं सकते उसको,
कोई शक्ति नहीं नियंत्रित करे उसको।
निश्चित अवधि के लिए धारण करती,
जगमें विभिन्न आदिभौतिक रूपों को
समय आने पर"सक्षम" छोड़ती उनको
यही है आदिभौतिक नश्वरता का रूप,
चला आरहा युगों से लिए नए स्वरूप।
यह सृष्टि,ब्रह्मांड सभी आदिभौतिक,
नहीं है इनमें ,कुछ भी पारलौकिक।
जग का कण-कण आदिभौतिक है,
दिखता हमें सभी कुछ काल्पनिक है
श्रीमती गायत्री ठाकुर "सक्षम" नरसिंहपुर ,मध्य प्रदेश
*विषय:- आदि भौतिक
*शीर्षक:- आदि भौतिक
*विधा :- मुक्तक
*दिन:- रविवार
*तिथि :- ०१-११-२०२०
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भूमि,गगन,वायु,अग्नि और मिलता है जब नीर।
आदि भौतिक तत्वों से मिलकर बना मानव शरीर।
तन-मंदिर की आत्मज्योति ही अमर ज्योति,प्राण हैं,
ये तन जग में एक पहचान है,नहीं किसी की जागीर।।
प्रतिभा तिवारी लखनऊ 🙏
आ0 महोदय जी व पटल पर उपस्थित सभी को आज का विषय सरल नहीं है फिर जो भी समझ में आया वो आप सब के समक्ष संक्षिप्त रुप में। आदिभौतिक भौतिक क्या है ? प्रकृति का वह रूप जिसका जड़त्व परिभाषित हो जाता है या जानने में आ जाता है भौतिक कहलाता है । आधुनिक समय में मानव ने प्रत्येक असम्भव कार्य कर दिखाएं हैं जिसका आदिकाल में साधारण मानव कल्पना भी नहीं कर सकता था । परन्तु आदि काल में भी मानव ने अपनी सूझ-बुझ अनुसार यथाशक्ति कार्य किए हैं । जैसा कि जगविदित है हमारे पूर्वजों ने काल अनुसार भौतिक ज्ञान प्राप्त किया। जैसा कि उन्होंने खुले में ना रहकर गुफाओं में रहना आरम्भ किया, पत्थरों के औजारों से शिकार करना, आग जलाना, कच्चे माँस को भुन कर खाना , पत्थरों से घर बनाना ,खेती -बाड़ी आरम्भ करना,पशु पालना, कपास तथा ऊन से वस्त्रों का निर्माण करना,लकड़ी का प्रयोग करना तथा पहिए से लेकर फर्नीचर बनाने तक का अविष्कार पहले ही हो चुका था । अपने बुद्धि बल के विकास से मानव ने पर्वतों की ऊँचाई से सागर की गहराई ,धरती की लम्बाई -चौड़ाई से सागर को माप लिया है ।यातायात के प्रत्येक तीव्र गति के वाहनों का अविष्कार किया ।अन्तरिक्ष की दूरियाँ जानी खगौलिय सैर की,अस्त्र-शस्त्रों को बहुविधियों से तैयार किया । आदि काल में भी हमारे महार्षि शक्तियों से परिपूर्ण विभिन्न क्षेत्रों में महाविज्ञानिक हुए हैं । अधिक जानकारी तो नहीं है परन्तु मैं कुछ विज्ञानिकों का उल्लेख करती हुं ।जैसे आर्यभट्ट तथा भास्कर महान गणितज्ञ एवं ज्योतिषिचार्य हुए हैं धन्वतरी, सुश्रुत,चरक यह महार्षि महान चिकित्सक एवं शल्य चिकित्सक हुए हैं । महार्षि कणाद परमाणु शस्त्र के तथा महार्षि बोधायन गणित के महाविज्ञानिक हुए है । भौतिक प्रकृति की वह गोद है जहाँ मानव विभिन्न प्रकार के अविष्कार करके तथा उनका भोग करके वहीं सो जाता है ।
*ललिता कश्यप सायर डोभा जिला बिलासपुर ( हि0 प्र0)*
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आज के विषय से इतर प्रोग्राम के उपरांत आई रचनाये व सम्मान आदि शाम ५.३० के बाद
कभी खिड़कियों पर कभी दहलीज पर जाकने आते हो
चाँद की तर्ह तुम बादलों के बीच रह कर बड़ा शर्माते हो
ख्वाबो में परीया तो कभी फरिश्ते के रूप में तुम आते हो
क्या पागल हो की चंचल मन लिए तुम हमे बड़ा तड़पाते हो
नादानियाँ ये हरकतें करके तुम क्या जताना चाहते हो
जुबा से बड़ा गभरते हो लेकिन आखों से फस जाते हो
दूर नहीं रह सकते एक पल फिर क्यो इतना उलझ रहे हो
फसलों के बीच जी नही सकते फिर दूरिया क्यों बना रहे हो
कलम से इतना गुस्सा क्यो कागज़ पर उतार रहे हो
बहुत हुई बहस हमारी बात तुम क्यो नही मान रहे हो ------नीक राजपूत गुजरात
समाज और साहित्य
आज का जो विषय है वास्तव में यह हमारे समाज का मूल आधार है। हम लोग वैसा ही जीवन यापन वैसी ही आदत अपने अंदर विकसित करने का प्रयास करते हैं जो हम साहित्य में पढ़ते हैं सुनते हैं या पूर्वजों द्वारा मुझे प्राप्त होता है। साहित्य ही वह धारा है जो समाज को अच्छाई की ओर अथवा बुराई की ओर बहा ले जाती है। यदि अच्छा साहित्य मिल जाता है जिसमें मानवता, ईमानदारी, वासुदेव कुटुंबकम तथा अन्य अच्छाइयां होती हैं तो लोग उस साहित्य को पढ़कर उसका अनुसरण करने का प्रयास करते हैं। और एक अच्छे समाज का निर्माण होता है। वहीं यदि साहित्य इसके विपरीत प्राप्त होता है तो उसका प्रभाव भी समाज पर नकारात्मक पड़ता है। आजकल समाज में जो बुराइयां फैल रही है उसका बहुत कुछ कारण आज सस्ती लोकप्रियता के लिए फैल रहा साहित्य भी है जो कुछ प्रतिशत साहित्यकारों द्वारा ही लिखा जाता है परंतु प्रभावित सारे साहित्य जगत को करता है और समाज के लिए एक खतरा बन जाता है हम सभी को बहुत ही गंभीरता से ऐसे साहित्य का सृजन करना चाहिए जिसमें मानव मूल्यों को समाहित करते हुए एक अच्छे समाज की कल्पना की गई हो यदि सभी साहित्यकार इस प्रकार के सृजन को सृजित करने लग जाएंगे तो निश्चय ही एक अच्छे समाज की सार्थक परिकल्पना हम कर सकते हैं हम सभी साहित्यकार ही एक अच्छे समाज के जनक होते हैं।।
हो सकता है मेरे कुछ बातों से कुछ साथी सहमत ना हो परंतु यह मेरे अपने विचार हैं जिन्हें मैं अच्छा समझता हूं और एक समाज के लिए आवश्यक भी समझता हूं। धन्यवाद ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम कानपुर नगर
विषय.. जीवन है उत्सव
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जीवन को यदि एक उत्सव मान
के खुशी संग जिया जाऐगा।।
तो ही तू इंसा हर दुख से लड़ के
तू हर बार भी मुस्काऐगा।।
रोज़ समझ दिन एक उत्सव है
खुशहाल जीवन मे बहा चला जाऐगा।।
कोई भी परेशानी आऐगी तो वो
खेल समझ खेलते हुए सुलझा तू जाऐगा।।
तेरा स्वभाव मधुर खिलखिलाता सभी
को सच भाऐगा।।
सभी के लिये प्रेरणा बन तू सितारों की
तरह सच जगमगाऐगा।।
जीवन है उत्सव ये गांठ बांध ले तू तो
तू तेरे संग वातावरण भी महक जाऐगा।। वीना आडवानी नागपुर, महाराष्ट्र *****
दीप शिखा ......
रागा रुण हो झूमती रहती है ।
दीपशिखा जलती है ।।
घोर अमावस रात की
तम सारा हरती है।।
महल अट्टारी झोपड़ी देहरी
हर्षित हो पलती है।
एक सा है प्रकाश भरती
कोई, भेद नहीं करती है।।
मंगलाचरण, द्वाराचार कर
घर-घर यह जगती है।
मानवता का दे संदेशा
स्वयं जल कर चुकती है।।
दीपक में तेल औ बाती
सृष्टी हम रहती है ।
प्रेम ज्योति का दृष्टी बाले -
पथ रोशन करती है।।
ज्योति नारायण
1/11/20
अनुनासिक शब्द चमत्कार
चाँद पुकारे चंदनिया को
हँसी चाँदनी लख नेह को।
हँसिनी मैं तेरी ओ प्रिय,
अंग लगा लो अब प्रिय।
उंगलियों में तेरा रोताचेहरा है,
अँगूठा पौंछता आँसूओ को है।
ढंग बेढंग हो गये रँग बेरंग,
मस्त मलंग न कर तंग संग।
कुंतल घने अलके खिली है,
कुंडलियां जागरण हुई है।
कुँअर मेरे साँवरे हुई बावरी सी,
सँवर गयी जिंदगी देहकली हँसी।
सुंदर सुखमय सजीला हो मीत।
अंगूर नारँगी आँवला भाये मीत।
अंक में आ गिरी तेरे विरहन वो।
छोड़ चला गया जिसे ढूँढती रो।
पलँग पे धरा के फूल बिखर गए,
भँवरेकलियों को मदमस्त कर गए।
बाँसुरी बजी वंशीवट तले मोहन।
काँधे लगी काँपती राधे हुई मगन।
बंद है मंदिर मूरत न दिखी कान्हा।
कुंदन सी कुंवारी तरसे देख आ ना।
सखियाँ अखियाँ चहूँ दिश फेरे हैं।
दुखियाँ सुखियाँ पँखिया घनेरे है।
चँचल चँवर डुलाती चितचोर कली
कँवर कान्हा रस पूँजी मुरली भली।
स्वरचित श्रीमती नीलम व्यास
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सम्पादकीय - आजके विषय व विषय के उपरांत दोनो मंचो को सम्मिलित प्रस्तुती स्पंदन के pdf - ब्लोग के मध्यम से आपके समक्ष -
आदि - अर्थात आदिकाल से
भौतिक अर्थात - पंचमहाभूत
अब इतना लिखने के बाद इन दोनो शब्दो के मिश्रित भाव को समझा जा सकता है और इसके अंदर निहित भाव का मेहती ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है मैने इसको इसलिये दिया था की आप शायद अपने प्राकृत भाव से जुडे है और बेहतरीन रचनाये लेकर
*आये
लेकिन ऐसा हो न सका **
सोचता था सोचना तो काम है मेरा
सोचता था सोचना तो काम है मेरा
लेकिन करतार ने वो होने न दिया//
इक युग बदल गया और आज का
भी दिन उसी के साथ जुड गया //
भी दिन उसी के साथ जुड गया //
काम थे कई मंजर बदल गया
सोचा था बहुत कुछ मगर वैसा
कुछ कुछ, ऐसा, हो न सका //
सोचा था बहुत कुछ मगर वैसा
कुछ कुछ, ऐसा, हो न सका //








सभी ने अपनी तरफ से उत्तम देने का प्रयास किया हैःः आदि भौतिक अर्थात पंचतत्व पृथ्वी जल आकाश अग्नि वायु इन्हीं में संपूर्ण ब्रह्मांड समाया है। इन्ही से सृष्टि का निर्माण होता है और इन्हीं से होती है प्रलय। जिसके उपरांत पुनः सृष्टि निर्माण प्रारंभ हो जाता है।
ReplyDeleteडॉ अरुण कुमार शास्त्री जी के द्वारा साहित्य सृजन की दिशा में अच्छा प्रयास किया जा रहा है ।वह बधाई के पात्र हैं।
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