अजय पंकज की पोस्ट से
चौथ_माता
बचपन यही कोई 8-9 साल का रहा होगा में ।
हमारी हीरो हौंडा बाइक पे टोंक शहर से माँ के दर्शन के लिए जाया करते थे ।
मुझे आज भी याद है ,में बाइक पे आगे बैठा करता था,
माँ के दर्शन की उत्सुकता इतनी होती थी ,की
नंगे पैर ,धुप में सीढ़िया पे इतनी तेजी से चढ़ जाता था ।
परिवार वाले पीछे रह जाते थे।
जब माता जी के मन्दिर का निर्माण कार्य चल रहा था ,तब में रेत के दो छोटे छोटे कट्टे ऊपर तक लेकर गया था,
आज जब में दोस्तों के साथ था तो मुझे ये सौभाग्य फिर से मिला
आज जब में दोस्तों के साथ था तो मुझे ये सौभाग्य फिर से मिला
आज माँ के मंदिर में फाइबर की सीट्स लग गयी है,
जिससे भक्तो को ऊपर तक जाने में दिक्कत नही आती।
जिससे भक्तो को ऊपर तक जाने में दिक्कत नही आती।
जब ऊपर माँ के दरबार में पहुँचा तो ,सुकून मिला
माँ ने जो बुलाया था ।
माँ ने जो बुलाया था ।
मेरी माँ चौथ माँ
🙏
चौथ का बरवाड़ा का सम्पूर्ण इतिहास चौथ माता शक्ति पीठ के इर्द गिर्द घूमता है, इस गाँव में चौथ भवानी का भव्य मंदिर है जो अरावली शक्ति गिरि पहाड़ श्रृंखला के ऊपर 1100 फीट की ऊँचाई पर स्थित है, इस मंदिर की स्थापना महाराजा भीमसिंह चौहान ने संवत 1451 में बरवाड़ा के पहाड़ पर की। वर्तमान चौथ का बरवाड़ा को प्राचीन काल में "बाड़बाड़ा" नाम से जाना जाता था जो कि रणथम्भौर साम्राज्य का ही एक हिस्सा रहा है, इस क्षेत्र के प्रमुख शासकों में बीजलसिंह एवं भीमसिंह चौहान प्रमुख रहे हैं।
बरवाड़ा क्षेत्र के पास चौरू एवं पचाला जो कि वर्तमान में गाँव बन गए हैं वो प्राचीन काल में घनघौर जंगलों में आदिवासियों के ठहरने के प्रमुख स्थल थे। चौथ माता की प्रथम प्रतिमाका अनुमान चौरू जंगलों के आसपास माना जाता है। एक किंवदंती के अनुसार कहाँ जाता है कि प्राचीन काल में चौरू जंगलों में एक भयानक अग्नि पुंज का प्राक्ट्य हुआ, जिससे दारूद भैरो का विनाश हुआ था। इस प्रतिमा के चमत्कारों को देखकर जंगल के आदिवासियों को प्रतिमा के प्रति लगाव हो गया और उन्होंने अपने कुल के आधार पर चौर माता के नाम से इसकी पूजा करने लगे, बाद मे चौर माता का नाम धीरे धीरे चौरू माता एवं आगे चलकर यही नाम अपभ्रंश होकर चौथ माता हो गया।

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